दुर्गा माता के नव स्वरूप ( चौथा स्वरूप)

हम “कूष्माण्डा” शब्द की संधि विच्छेद करेंगे,
“कू” का अर्थ है “कुछ”, “उष्मा” का अर्थ है “ताप” और “अंडा” का अर्थ है “ब्रह्मांड” मतलब थोड़ी ही उष्मा से पूरे ब्रह्मांड को उत्पन्न किया, इसलिए यह स्वरूप कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है।

माता ने ब्रह्मांड को अपने मंद हास्य से उत्पन्न किया था इसलिए यह स्वरूप आदिशक्ति भी कहा गया है। यह प्राण शक्ति का स्वरूप है, पूरा जगत, उनके उदर से उत्पन्न हुआ है।

दुर्गा माता के यह स्वरूप में बहुत ही तेज है, कूष्माण्डा देवी सूर्य लोक में निवास करते है, सूर्य लोक में निवास करने की शक्ति और क्षमता है, तो सोचिए, उनमें कितना सारा तेज होगा। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में जो भी तेज है इन्ही के कारण है।

श्री देवी सूक्तम स्त्रोत में एक पंक्ति है, जिसमें देवी को आदिशक्ति का स्वरूप कहा गया है।

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

अर्थात्

जो देवी सबमें शक्ति के रूप में स्थित है, उनको हम नमस्कार, नमस्कार और निरंतर नमस्कार कर रहे है।

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