दुर्गा माता के नव स्वरूप

पहला स्वरूप – शैलपुत्री दूसरा स्वरूप – ब्रह्मचारीणी तीसरा स्वरूप – चंद्रघंटा (सुंदरता और निर्भयता का स्वरूप) चौथा स्वरूप – कूष्माण्डा पांचवा स्वरूप – स्कन्ध

#चार आश्रम #सनातन धर्म #संस्कृत श्लोक

प्रथमेनार्जिता विद्या द्वितीयेनार्जितं धनं।तृतीयेनार्जितः कीर्तिः (पुण्य कमाना)चतुर्थे किं करिष्यति।। भावार्थ: जिसने भी प्रथम आश्रम (ब्रह्मचर्य) में विद्या अर्जित नहीं की है, द्वितीय आश्रम (गृहस्थ) में

संघर्ष की तपिश

क्यूं तू संघर्ष से घबराता है?संघर्ष ही तुझे तराशता है। जैसे आत्म मंथन करने से ज्ञान मिलता है,वैसे संघर्ष करने से अनुभव मिलता है। संघर्ष

#प्रेम #स्वतंत्रता

“स्वतंत्रता मनुष्य की परम इच्छा है, स्वतंत्रता में ही मनुष्य खिल सकता है, ध्यान करने से स्वतंत्रता पाएंगे। स्वतंत्रता को तुम्हारा केन्द्र और प्रेम को

नया नूर आ गया

नया नूर आ गया,चेहरे पर छा गया।जब अपनों से,जो गिले-शिकवे थे,वो दूर कर दिये,तब नया नूर छा गया। कुछ उनकी गलती थी,कुछ मेरी गलती थी,जब

इश्वर याचना

जो तेरा ही है,वो तुझे अर्पण। हे ईश्वर, हे जगत पिताहम तुझे क्या दे सकते हैं? हमारा कुछ भी नहीं,तूने ही सब सर्जन किया है।

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