गणेश स्त्रोतम् (तृतीय भाग)

(आदि शंकराचार्य द्वारा रचित- संस्कृत भाषा में)

अजं निर्विकल्पं निराकारमेकं
निरानन्दमानन्द अद्वेतापूर्णम्।
परं निर्गुणं निर्विशेषं निरीहं
परब्रह्म रूपं गणेशं भजेम।।

गुणातीतमानं चिदानन्दरूपम्
चिदाभासकं सर्वगं ज्ञानगम्यम्।
मुनिन्ध्येयमाकाशारूपं परेशं
परब्रह्म रूपं गणेशं भजेम।।

जगत्-कारणं कारण- ज्ञानरूपं
सुरादिं सुखादिं गुणेशं गणेशं।
जगद्व्यापिनं विश्ववन्धं सुरेशं
परब्रह्म रूपं गणेशं भजेम।।

(स्त्रोत् का हिन्दी भाषा में भाषांतर)

श्री गणेश आप कभी जन्मे नही हो, आपका सदा एक ही रूप है ( स्थिर रूप वाले), आपका कोई आकार नही है, आप आनंद से परे हो और पूर्ण आनंद ही हो, आप किसी भेदभाव के बिना पूर्ण हो (जीव- ब्रह्मा का एक्य), आप ही श्रेष्ठ हो, सब गुणो से परे हो (सत्व, रजस और तमस), सदैव समान रहने वाले हो ( विशेषताओ से परे), सभी इच्छाओं से रहित है, श्री गणेश आपकी हम पूजा कर रहे है जिनका रूप सर्वोच्च-ब्रह्म का है। (सर्वोच्च ब्रह्म – जो सभी वर्णनो से परे है)

श्री गणेश आप सभी गुणो से भिन्न है, आप ही आनंद की अभिव्यक्ति हो, आप ही आनंद को प्रकाशित करते हो, आप ही सर्वव्यापी ज्ञान का स्त्रोत है, आप ही वो है जिनका मुनि ध्यान धरते है, आप का रूप आकाश की तरह निराकार है, आप ही सबके स्वामी हो (परमेश्वर), श्री गणेश आपकी हम पूजा कर रहे है जिनका रूप सर्वोच्च-ब्रह्म का है। (सर्वोच्च ब्रह्म – जो सभी वर्णनो से परे है)

श्री गणेश आप ही जगत के कारण हो, आप ही ज्ञान स्त्रोत का कारण हो, आप ही सब देवों का मूल हो ( उत्पत्ति का कारण), आप ही सब सुखो का स्त्रोत हो, सब गुणो के देव हो, सब गणो के देव हो (गणपति), आप ही जगत में सर्वत्र व्याप्त हो इसलिए पूरे विश्व में पूजनीय हो, आप ही सब देवों के स्वामी हो, श्री गणेश आपकी हम पूजा कर रहे है जिनका रूप सर्वोच्च-ब्रह्म का है। (सर्वोच्च ब्रह्म – जो सभी वर्णनो से परे है)

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