संस्कृत श्लोक अर्थ सहित (4) #नवरात्रि #दुर्गा #सिद्धीदात्री

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ।। अर्थात्: आप सभी कार्यों में मंगल प्रदान करनेवाली हो, भक्त का कल्याण करने वाली हो, सभी पुरुषार्थ ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) को साधने वाली हो, भक्त को शरण देने वाली गौरी हो। तीन नेत्रों वाली, हे नारायणी! आप को हम नमन करते हैं। दुर्गा का नौवा स्वरूप सिद्धीदात्री है। हमें सभी... Continue Reading →

देवी मंत्र / MANTRA for GODDESS (Reblog with a slight modification)

ॐ आनंदमयी चैतन्यमयी सत्यमयी परमे।अर्थात्:हे माँ, तुम आनंद का स्रोत हो, तुम चेतना का स्रोत हो,और तुम सत्य का स्रोत हो, तुम ही सर्वोच्च हो। सच्चिदानंद, यह संस्कृत शब्द का भी ध्यान किया जाता है, सच्चिदानंद का अर्थ “सत”, “चित”, “आनंद” होता है। सत का अर्थ सत्य, अस्तित्व होता है।चित का अर्थ चेतना होता है।आनंद... Continue Reading →

#चार आश्रम #सनातन धर्म #संस्कृत श्लोक

प्रथमेनार्जिता विद्या द्वितीयेनार्जितं धनं।तृतीयेनार्जितः कीर्तिः (पुण्य कमाना)चतुर्थे किं करिष्यति।। भावार्थ: जिसने भी प्रथम आश्रम (ब्रह्मचर्य) में विद्या अर्जित नहीं की है, द्वितीय आश्रम (गृहस्थ) में धन अर्जित नहीं किया है, तृतीय आश्रम (वानप्रस्थ) में कीर्ति अर्जित नहीं की है (पुण्य नहीं कमाया), वह चतुर्थ आश्रम (संन्यास) में क्या करेगा? सनातन धर्म में कर्त्तव्य पालन के... Continue Reading →

शिव भक्ति की महिमा

शिवो भूत्वा शिवं यजेत।अर्थात्शिव बनकर ही शिव की पूजा करें। इसका यह मतलब है कि हर एक जीव शिव का ही अंश है, यह अनुभूति के साथ उनकी पूजा करें। आराधना करें तो शिव में खोकर करें। हम शिव से अलग नहीं है, हम शिव का ही अंश है, यह विचार मात्र से ही भगवान... Continue Reading →

प्रेम के छह लक्षण (Six signs of love)

ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति।भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम्।। अर्थात्: देना, लेना, एक-दूसरे के रहस्य बताना, रहस्य के बारे में कुछ भी पूछना, खाना और खिलाना -- ये छह प्रेम के संकेत हैं। सच ही कहा है, प्रेम में कुछ भी छिपा नहीं होता है, कुछ भी पूछ सकते हैं और सब कुछ बता सकते हैं,... Continue Reading →

#संस्कृत श्लोक अर्थ सहित (3) #एकमत होना # विवाद से मुक्त #कर्तव्य पालन

सं गच्छध्वं सं वदध्वं, सं वो मनांसि जानताम् ।देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ।। अर्थात्:हम मनुष्यो को (सं गच्छध्वम्) मिलकर चलना चाहिए। (सं वदध्वम्) मिलकर बोलना चाहिए। हमारे मन एक प्रकार के विचार करें, जैसे प्राचीन देवो या विद्वानों ने एकमत होकर अपने - अपने भाग को स्वीकार किया, इसी प्रकार हम भी एकमत... Continue Reading →

नैवेद्य मंत्र अर्थ सहित (2) (सभी देवी-देवताओं को भोग लगाने का मंत्र)

नैवेद्य मंत्र अर्थ सहित (1) (कृष्ण भगवान को भोग लगाने का मंत्र) शर्करा-खण्ड-खाद्यानि दधि-क्षीर-घृतानि च ।आहारम्‌ भक्ष्य-भोज्यम्‌ च नैवेद्यम्‌ प्रति-गृह्यताम्‌ ॥ अर्थात्: शर्करा-खण्ड ,खाध पदार्थ दही, दूध, घी जैसी खाने की वस्तुओं से युक्त भोजन आप ग्रहण करें। संस्कृत अन्नवर्ग शब्दावली:शर्करा-खण्ड - बताशा आदि मिठाईदधि - दहीक्षीर- दूधघृत - घी Buy Now: Jivan Ke ShabdAmazon... Continue Reading →

नैवेद्य मंत्र अर्थ सहित (1) (कृष्ण भगवान को भोग लगाने का मंत्र)

त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर।। अर्थात् हे गोविन्द, आपका ही सब दिया हुआ है, जो आपको ही समर्पित कर रहे हैं,हे परमेश्वर, आपके मुख के सामने जो भी है, उसे प्रसन्नता से ग्रहण करें। अन्य संस्कृत ब्लॉग: उपनिषद वचन #संस्कृत #योग / SANSKRIT QUOTES WITH MEANING (3) अच्छे स्वास्थ्य के लिए... Continue Reading →

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