5 comments

    • हा.. यही होता है.. क्योंकि मन का स्वभाव ही है, पकड़ कर रखना, तो जब मेरे साथ एसा होता है तो मैं यही करती हू कि ( practice of let go, release those memories or failure) जाने देती हू, मूझे क्या सीख मिली इससे, ये सोचकर, उस भावनाओं से मुक्त हो जाती हू। बुरा हुआ, या जो चाहा, वो हुआ नही, एसा पहले पूरा स्वीकार करती हू और सीख मान लेती हू क्योंकि मुक्त हो सकु। (Practice of let go, I train my mind in this philosophy and get released from my old misery- that’s what I do..I share with you my strategy)😊😊

  1. This is true, and why to keep thinking about past which you cannot change, One should look for present & future ahead.

    किसी के ग़म में क्यूँ रहूँ खुद से जुदा जुदा,
    मेरे खुश रहने का हक्क, मैंने खुद के हाथ अब ले ली,

Leave a Reply