प्रेम के पन्नों पर धूल जम गई
भीड़ में ही रहती हूँ,क्योंकि अकेले में रह नहीं पाती। भीड़ के माहौल में खो जाती हूँ,क्योंकि अपने गम में न खो जाऊं। नये माहौल की ही तलाश में रहती हूँ,क्योंकि जो माहौल है, वो चुभता है। हर पल घुटन है,हर पल विश्वसनीयता की कमी है,हर पल बनावटी बातें है। चुभन एक सज़ा बन चुकी…
