उलझनों से स्पष्टता की तरफ़!

जीवन जीने के लिए विचारों में स्पष्टता बहुत आवश्यक है, हमें विचारों में स्पष्टता के साथ जीना चाहिए, मन की भ्रमित स्थिति, उलझनों के साथ, शंका के साथ नहीं जीना चाहिए बल्कि उसके समाधान की तरफ ध्यान देना चाहिए। उलझनें तो स्वाभाविक है, यह जीवन का हिस्सा है लेकिन इसे दूर करने का प्रयास ही... Continue Reading →

परिवार की नींव/ Foundation of family [Family illustration-3]

કુટુંબની એકતા [UNITY OF FAMILY] [FAMILY ILLUSTRATION- 1] BEAUTY OF FAMILY -FAMILY ILLUSTRATION- 2 [ENGLISH VERSION] परिवार की सुंदरता (भावनाएं)(FAMILY ILLUSTRATION-2) (HINDI VERSION) संवाद:संबंध को मजबूत करने और गलतफहमी से बचने के लिए एकदम ज़रूरी है। स्वीकार:परिवार के हर सदस्य के गुण-अवगुण को स्वीकार करना चहिए, नकारात्मक तरीके से नहीं देखना चाहिए और ना ही सिर्फ... Continue Reading →

परिवार की सुंदरता (भावनाएं)(Family Illustration-2) (Hindi version)

કુટુંબની એકતા [UNITY OF FAMILY] [FAMILY ILLUSTRATION- 1] BEAUTY OF FAMILY -FAMILY ILLUSTRATION- 2 [ENGLISH VERSION] परिवार की सुंदरता एक-दूसरे के प्रति अपनेपन की भावना में, विश्वास की भावना में, और एकता की भावना में है।तो हम क्यों असुरक्षा महसूस करते हैं, संदेह पैदा करते हैं, हमेशा एक-दूसरे का विरोध करते रहते हैं और क्यों... Continue Reading →

Beauty of family -Family Illustration- 2 [English Version]

કુટુંબની એકતા [UNITY OF FAMILY] [FAMILY ILLUSTRATION- 1] Above family illustration-1 is my first illustration on the blog, please have a look! A family is a beauty of security, sense of belongingness, trust and unity.So why we create mess by feeling insecurity, by creating doubt and try to oppose each other always?

तुम मेरा आयना हो

''YE AINAA HE'' song from Kabir Singh movie inspired me to write a beautiful poem and sing a song. Hope you like it! My expression in the form of poetry. तुम मेरा आयना हो। तुम से ही मैंनेखुद को देखा। तुम से ही मैंनेमेरी खूबसूरती देखी। तुम से ही मैंनेमेरी हर अदा देखी। तुम से... Continue Reading →

संस्कृत गीत (जीवन का गीत)

संस्कृत गीत का हिंदी में भाषांतर भी दिया हुआ है। गीत के रचनाकार स्व. पद्मश्री डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर जी है। गीत: मनसा सततं स्मरणीयम्वचसा सततं वदनीयम्लोकहितं मम करणीयम् ॥ लोकहितं॥ न भोगभवने रमणीयम्न च सुखशयने शयनीयनम्अहर्निशं जागरणीयम्लोकहितं मम करणीयम् ॥ मनसा॥ न जातु दु:खं गणनीयम्न च निजसौख्यं मननीयम्कार्यक्षेत्रे त्वरणीयम्लोकहितं मम करणीयम् ॥ मनसा॥ दु:खसागरे... Continue Reading →

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