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एक-दूजे के लिए
जैसे नदी बहती है, सागर के लिए। वैसे हम जीते है, एक-दूजे के लिए। जैसे बाती जलती है, दिये के लिए।वैसे हम जीते है, एक-दूजे के लिए।
विचारो की माला- गिरने का डर (सवाल-जवाब के रूप में)
किसी ने मुझसे पूछा,तुम को गिरने का डर नही लगता?तो मैंने जवाब दिया, पहले बहुत डर लगता था गिरने का,तब गिरने का अनुभव जो ना था,तब लोगों के द्वारा गिराया गया जो ना था। पर अब बात कुछ और है,अब डर नहीं लगता गिरने काक्योंकि गिरकर संभलने का हुनर जो पा लिया।
