भिन्नता का रंग

हर दिन एक सा नहीं,हर दिन की अलग कहानी। एक दिन प्रसन्नता में बितता है,तो एक दिन खिन्नता दस्तक दे जाती है। एक दिन उत्साह में बितता है,तो एक दिन बोरियत दस्तक दे जाती है। एक दिन अनुकूलता में बितता है,तो एक दिन प्रतिकूलता दस्तक दे जाती है। एक दिन स्पष्ट परिस्थितियों में बितता है,तो... Continue Reading →

#લઘુકાવ્ય #लघुकाव्य – 4

આ મારા વ્હાલા નેઆ મારા અળખામણા,આવી મનોવૃત્તિ હતી પહેલા.પણ જ્યારથી અંતર માં હું જપ્રેમ ના પુષ્પો ખીલવી ને,પ્રેમ ની સુગંધ વેરુ છું,ત્યારથી બધા જ મને વ્હાલા લાગે છે! हिंदी में अनुवाद पहले मुझे कुछ लोग प्यारे थे,और कुछ लोग प्यारे नहीं थे,कुछ एसी थी, मेरी मनोवृत्ति।पर जब से प्रेम के फूल,खिले हैं अंतर में मेरे,तब... Continue Reading →

#લઘુકાવ્ય #लघुकाव्य – 3

અંતર માં સુગંધ પ્રસરી છે,પ્રસન્નતા ની આજે!જાણે કે પરમ આનંદ નાં,પુષ્પો ખીલ્યાં છે આજે! हिंदी में अनुवाद अंतर महक उठा है,प्रसन्नता से आज!जैसे कि परम आनंद के फूल खिले हो आज!

International Day of Yoga संस्कृत मंत्र से, योग का महत्व

पतंजलि प्रार्थनायोगेन चित्तस्य पदेन वाचांमलं शरीरस्य च वैद्यकेन ।योऽपाकरोत्तमं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि ॥ हिंदी में अनुवाद:मन की चित्त वृत्तियों को को योग से, वाणी को व्याकरण से और शरीर की अशुद्धियों को आयुर्वेद द्वारा शुद्ध करने वाले मुनियों में सर्वश्रेष्ठ महर्षि  पतंजलि को में दोनों हाथ जोड़कर नमन करता हूँ।इस श्लोक को योगाभ्यास के शुरू में गाया जाता है।'योग' शब्द संस्कृत से लिया गया है... Continue Reading →

अंदाज़ है मेरा नया!

यह कविता जीवन में कुछ नया करने की चाहत महसूस हो या ज़रुरत महसूस हो, तब हमारे मन में जिस तरह के भाव उठते हैं, उसके बारे में है। अब नया पन्ना खुलेगा,मेरे जीवन की किताब में से। पढ़ना है नया पन्ना,नये रुप के साथ। करना है नया,लिखना है नया।बोलना है नया,जीना है नया।मिलना है... Continue Reading →

द्वंद्व से भरा जीवन!

जीवन की अभिव्यक्ति द्वंद्व में है। जीवन द्वंद्वात्मक है, डायलेक्टिकल है।इसलिए यहां प्रकाश है और अंधेरा है।जन्म है और मृत्यु है।अच्छा है और बुरा है।सफेद है और काला है।सुंदर है और कुरुप है।राम है और रावण है। जो जानते हैं वे कहेंगे: दोनों में उसका ही खेल है।जो हम एसा जान ले, फिर हमें अड़चन... Continue Reading →

संस्कृत सुभाषित अर्थ सहित (2)

(1)श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुंडलेन, दानेन पार्णिन तु कंकणेन।विभाति काय: करूणापराणा, परोपकारैन तु चंदननेन।। अर्थात् कानों की शोभा कुंडलो से नहीं अपितु ज्ञान की बातें सुनने से होती है, हाथ दान करने से सुशोभित होते हैं न कि कंकणो से, दयालु और सज्जन व्यक्तियों का शरीर चंदन से नहीं बल्कि दूसरों का हित करने से शोभा... Continue Reading →

तराजू (SCALES) – Reblog

जीवन के तराजू में खुशी और गम, दोनो का पलड़ा, कोई एक तरफ ही नही जूकेगा, संतुलन बना ही रहेगा। आप पर खुशीयों की बारिश हो रही हो,तो भी अपने पैर जमी पर ही रखना। आप पर गम की बारिश हो रही हो,तो भी अपने दिल को तूटने मत देना। जीवन का सही मायने में... Continue Reading →

उपनिषद वचन

"अन्नं ब्रह्म।" यह वचन उपनिषद में है, जिसका सीधा सीधा शाब्दिक अनुवाद करें तो एसा होगा कि भोजन ब्रह्म है। [अंग्रेजी में फुड इज गोड( Food is God)] पर इतने महत वचनों के सीधे सीधे शाब्दिक अनुवाद नहीं होते, एसे वचनों को समझना पड़ता है, गहराई के भाव को जानना पड़ता है। "अन्नं ब्रह्म" का... Continue Reading →

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