तराशना चाहती हू कुछ

तराशना चाहती हू कुछ,
निखारना चाहती हू कुछ।

मैं ढूंढ रही हू,
मेरी आवाज़…!
जो अमानवीयता देखकर,
मौन ही हो गई।

मैं ढूंढ रही हू,
मेरी द्रढता…!
जो कार्यो को पूजा की तरह करे,
ना की प्रसिद्ध पाने के लिए करे।

मेरी आवाज़, मेरी द्रढता,
जो मुझ में ही है।
उसे आत्मविश्वास से ढूंढके,
अमल में लाना है।

तराशना चाहती हू कुछ,
निखारना चाहती हू कुछ।

11 comments

  1. बहोतखूब अच्छी लेखनी है काफ़ी प्रेरणार्थक है✍️
    Keep writing and stay self motivated.

    “अब-जब अकेले चलना तो डर कैसा,
    अड़चनें लाख हों, ठहर कैसा,
    विश्राम में कट गयीं लाखों घड़ियां,
    ठोकरों से जो मचल जाय, लहर कैसा।”

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  2. आपका लिखा काफ़ी कुछ मिलता है मेरे विचारों से ….क्या हम मिले थे कभी 😊🙏🏻
    “ ऐसी ऊँचाई किस काम की
    बैठ कर इनके सिरों पर मुँह चिढ़ाती हैं मंज़िले
    ख़ुदगर्ज़ है बुलंदी इनकी,
    जो नाउम्मीद कर दें नौजवानों को भी
    सपने भी डर जाए उनकी ऊँचाई से ही
    जिन मीनारों पर चढ़ने की बजाए
    नीचे कूद जाना सरल लगता हो
    ऐसी हर मगरूर इमारत को ..गिराना चाहती हूँ मैं”

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    1. जी बिलकुल सही कहा आपने, मूझे भी यहू एहसास हुआ था, काफी हद तक हमारी लेखनी मिलती है, बहुत ही खुशी हुई मूझे इस बात की।

      वाह, आपके हर एक शब्द दिल को छू गए।☺️☺️

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